नाथ नील नल कपि द्वौ भाई

चौपाई १, दोहा ६० के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥ तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥ १ ॥

अर्थ

[समुद्र ने कहा--] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श किए जाने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जायँगे।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “राम का क्रोध, समुद्र की विनती” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के धर्मसम्मत क्रोध और भयभीत समुद्र की विनम्र प्रार्थना एवं मार्गदर्शन का वर्णन है।

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राम का क्रोध, समुद्र की विनती