सुखी मीन जे नीर अगाधा
सुखी मीन जे नीर अगाधा
चौपाई १, दोहा १७ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा॥ फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा॥ १ ॥
अर्थ
जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्रीहरि के शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों के फूलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “शरद ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शरद ऋतु की निर्मल आकाश, स्वच्छ जल और शांत प्रकृति की सुंदर छटा का वर्णन है।
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शरद ऋतु वर्णन