चले हरषि तजि नगर नृप तापस

दोहा १६ · किष्किन्धाकाण्ड

दोहा पाठ

चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि। जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥ १६ ॥

अर्थ

[शरद् ऋतु पाकर] राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी [क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षा के लिये] हर्षित होकर नगर छोड़कर चले। जैसे श्रीहरि की भक्ति पाकर चारों आश्रमवाले [नाना प्रकार के साधनरूपी] श्रमों को त्याग देते हैं।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “शरद ऋतु वर्णन” प्रकरण का दोहा १६ है। इस प्रकरण में शरद ऋतु की निर्मल आकाश, स्वच्छ जल और शांत प्रकृति की सुंदर छटा का वर्णन है।

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शरद ऋतु वर्णन