गुंजत मधुकर मुखर अनूपा

चौपाई २, दोहा १७ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा॥ चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी॥ २ ॥

अर्थ

भौरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, तथा पक्षियों के नाना प्रकार के सुन्दर शब्द हो रहे हैं। रात्रि देखकर चकवे के मन में वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की संपत्ति देखकर दुष्ट को होता है।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “शरद ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शरद ऋतु की निर्मल आकाश, स्वच्छ जल और शांत प्रकृति की सुंदर छटा का वर्णन है।

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शरद ऋतु वर्णन