रस रस सूख सरित सर पानी
रस रस सूख सरित सर पानी
चौपाई ३, दोहा १६ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड
चौपाई पाठ
रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥ जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥ ३ ॥
अर्थ
नदी और तालाबों का जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी (विवेकी) पुरुष ममता का त्याग करते हैं। शरद ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गये। जैसे समय पाकर सुन्दर सुकृत आ जाते हैं (पुण्य प्रकट हो जाते हैं)।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “शरद ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शरद ऋतु की निर्मल आकाश, स्वच्छ जल और शांत प्रकृति की सुंदर छटा का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
शरद ऋतु वर्णन