पंक न रेनु सोह असि धरनी

चौपाई ४, दोहा १६ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी॥ जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना॥ ४ ॥

अर्थ

न कीचड़ है न धूल; इससे धरती [निर्मल होकर] ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजा की करनी! जल के कम हो जाने से मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख (विवेकशून्य) कुटुम्बी (गृहस्थ) धन के बिना व्याकुल होता है।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “शरद ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शरद ऋतु की निर्मल आकाश, स्वच्छ जल और शांत प्रकृति की सुंदर छटा का वर्णन है।

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शरद ऋतु वर्णन