चातक रटत तृषा अति ओही

चौपाई ३, दोहा १७ के अंतर्गत · किष्किन्धाकाण्ड

चौपाई पाठ

चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही॥ सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई॥ ३ ॥

अर्थ

पपीहा रट लगाये है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे शंकरद्रोही सुख नहीं पाता (सुख के लिए झीखता रहता है)। शरद ऋतु के ताप को रात के समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “शरद ऋतु वर्णन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शरद ऋतु की निर्मल आकाश, स्वच्छ जल और शांत प्रकृति की सुंदर छटा का वर्णन है।

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शरद ऋतु वर्णन