वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं
श्लोक ३ · बालकाण्ड
श्लोक पाठ
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥ ३ ॥
अर्थ
ज्ञानमय, नित्य, शंकररूपी गुरुकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित होनेसे ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक ३ है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा सरस्वती, गणेश, भवानी-शंकर, गुरु और श्रीराम की वंदना एवं दिव्य कृपा की याचना का वर्णन है।
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मंगलाचरण