मुद मंगलमय संत समाजू

चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥ राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥ ४ ॥

अर्थ

संतोंका समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत्‌में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहाँ (उस संतसमाजरूपी प्रयागराजमें) रामभक्तिरूपी गड़गजीकी धारा है और ब्रह्मविचारका प्रचार सरस्वतीजी हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “गुरु वन्दना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु-चरण-वन्दना और उनकी कृपा से अज्ञान-नाश तथा रामकथा-बोध का वर्णन है।

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गुरु वन्दना