नर पीड़ित रोग न भोग कहीं
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं
छन्द २, दोहा १०२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं॥ लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा॥ २ ॥
अर्थ
मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा-सा जीवन है, परन्तु घमंड ऐसा है मानो कल्पान्त (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का छन्द २, दोहा १०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा