मैं खल मल संकुल मति नीच
मैं खल मल संकुल मति नीच
दोहा १०५ (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह। हरिजन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह॥ १०५ (क) ॥
अर्थ
मैं दुष्ट, नीच जाति और पापमयी मलिन बुद्धिवाला मोहवश श्रीहरि के भक्तों और द्विजों को देखते ही जल उठता और विष्णु भगवान से द्रोह करता था।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का दोहा १०५ (क) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा