जे बरनाधम तेलि कुम्हारा

चौपाई ३, दोहा १०० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा॥ नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी॥ ३ ॥

अर्थ

तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्ण में नीचे हैं, स्त्री के मरने पर अथवा घर की सम्पत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।

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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा