इरिषा परुषाच्छर लोलुपता

छन्द ४, दोहा १०२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता॥ सब लोग बियोग बिसोक हए। बरनाश्रम धर्म अचार गए॥ ४ ॥

अर्थ

ईर्ष्या (डाह), कड़वे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गयी। सब लोग वियोग और विशेष शोक से भरे पड़े हैं। वर्णाश्रम-धर्म के आचरण नष्ट हो गये।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का छन्द ४, दोहा १०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा