हरइ सिष्य धन सोक न हरई
हरइ सिष्य धन सोक न हरई
चौपाई ४, दोहा ९९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥ मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥ ४ ॥
अर्थ
जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरता, वह घोर नरक में पड़ता है। माता-पिता बालकों को बुलाकर वही धर्म सिखाते हैं, जिससे पेट भरे।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा