धन मद मत्त परम बाचाला
धन मद मत्त परम बाचाला
चौपाई २, दोहा ९७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला॥ जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी॥ २ ॥
अर्थ
मैं धन के मद से मतवाला, बहुत ही बकवादी और उग्रबुद्धिवाला था; मेरे हृदय में बड़ा भारी दम्भ था। यद्यपि मैं श्रीरघुनाथजी की राजधानी में रहता था, तथापि मैंने उस समय उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म-वृत्तांत और कलियुग की महिमा एवं भक्ति की शरण का वर्णन है।
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काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म, कलि महिमा