सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने
चौपाई १, दोहा १२८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने॥ बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी॥ १ ॥
अर्थ
मुनि के प्रेमरस से सने हुए वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी [रहस्य खुल जाने के डर से] सकुचाकर मन में मुसकराये। वाल्मीकिजी हँसकर फिर अमृत-रस में डुबोयी हुई मीठी वाणी बोले--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम और महर्षि वाल्मीकि का मिलन तथा प्रभु के सच्चे निवास का आध्यात्मिक उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद