प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा

चौपाई १, दोहा १२९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥ तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥ १ ॥

अर्थ

जिसकी नासिका प्रभु (आप) के पवित्र और सुगन्धित [पुष्पादि] सुन्दर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती (सूँघती) है, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसाद-रूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं;।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम और महर्षि वाल्मीकि का मिलन तथा प्रभु के सच्चे निवास का आध्यात्मिक उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद